‘चमगादड़ की रात’ ने दर्शकों को हंसाया भी, व्यवस्था पर सोचने को मजबूर भी किया
रविवार, 13 सितंबर 2026
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संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से अहसास कलाकृति द्वारा डॉ. प्रमोद कुमार सिंह लिखित एवं कुमार मानव निर्देशित हास्य-व्यंग्य नाटक ‘चमगादड़ की रात’ का प्रभावशाली मंचन प्रेमचंद रंगशाला सभागार में किया गया। इस प्रस्तुति ने हास्य और व्यंग्य के माध्यम से सत्ता की चाटुकारिता, राजनीतिक स्वार्थ और सरकारी व्यवस्था की विसंगतियों पर करारा प्रहार किया। दर्शक जहां कई प्रसंगों पर जमकर हंसे, वहीं नाटक ने उन्हें व्यवस्था और सामाजिक मानसिकता पर गंभीरता से सोचने के लिए भी मजबूर किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ उद्घाटनकर्ता भारतीय जीवन बीमा निगम, पटना शाखा-3 के मुख्य प्रबंधक श्री अरुण कुमार, मुख्य अतिथि प्रो. कमल प्रसाद बौद्ध, निदेशक, बुद्धा स्टडीज़ एंड एडवांस्ड रिसर्च सेंटर, पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी, पटना तथा विशिष्ट अतिथि कला संस्कृति पुरुष व वरिष्ठ पत्रकार विश्व मोहन चौधरी संत,प्रमोद कुमार सिंह, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय एवं सैयद अता करीम, वरिष्ठ रंगकर्मी, सेवानिवृत्त अवर सचिव, शिक्षा विभाग, बिहार सरकार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
नाटक की कहानी एक ऐसे गांव से शुरू होती है, जहां अंधेपन की समस्या से परेशान ग्रामीण अपनी आवाज सत्ता के दरबार तक पहुंचाते हैं। वहां उनका सामना राजा सिलसिला से होता है, जिसे जनता की समस्याओं से अधिक अपनी प्रशंसा और चाटुकारिता पसंद है। समस्या के समाधान के लिए गठित आयोग बैठकों और कागजी कार्रवाई में उलझ जाता है। विडंबना तब चरम पर पहुंचती है, जब अंधों की संख्या 60 प्रतिशत से बढ़कर 80 प्रतिशत होने की रिपोर्ट आती है और राजा शेष 20 प्रतिशत लोगों की आंखें भी बंद कर देने का आदेश देता है। इसी बीच स्वयं राजा के देखने में असमर्थ हो जाने पर व्यवस्था का हास्यास्पद चेहरा सामने आता है और उसके अंधेपन की जांच के लिए नया आयोग गठित करने की घोषणा होती है।
नाटक में राजा सिलसिला की भूमिका में निर्देशक कुमार मानव ने प्रभावशाली अभिनय से अपनी छाप छोड़ी। शंकर की भूमिका में विजय कुमार चौधरी ने सशक्त संवाद अदायगी से दर्शकों को प्रभावित किया। सदानंद के रूप में भुवनेश्वर कुमार और मदारी की भूमिका में सरबिंद कुमार विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र रहे। रामभरोसे के रूप में बलराम कुमार, वाटिका की अर्चना कुमारी और पुष्पा की विजया लक्ष्मी ने भी अपनी भूमिकाओं को प्रभावी ढंग से निभाया। अन्य भूमिकाओं में राज किशोर पासवान, मयंक कुमार, संतोष कुमार, रविदास, निरंजन कुमार ‘छुच्छे’, अभिमन्यु कुमार, संत जी, मंतोष कुमार, रामबाबू राम, आर्यन कुमार गुप्ता, करण कुमार एवं सूरज कुमार ने योगदान दिया।
प्रस्तुति को प्रभावी और जीवंत बनाने में मंच के पीछे काम करने वाली टीम की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। मंच संचालन मानसी कुमारी, प्रकाश परिकल्पना राजीव रॉय, मंच परिकल्पना संतोष कुमार एवं सुनील कुमार, रूपसज्जा माया कुमारी, वस्त्र विन्यास अनिता कुमारी तथा पार्श्वध्वनि मानसी कुमारी ने संभाली।
नाटक का मूल संदेश यह रहा कि अंधापन केवल आंखों का नहीं होता; सच सामने होते हुए भी उसे देखने और स्वीकार करने का साहस न होना भी एक प्रकार का सामाजिक और मानसिक अंधापन है।
प्रस्तुति के अंत में दर्शकों ने कलाकारों के अभिनय, संवाद, निर्देशन और व्यंग्यात्मक शैली की सराहना की। ‘चमगादड़ की रात’ मनोरंजन के साथ दर्शकों के सामने एक गंभीर सवाल छोड़ गया—
अंधा कौन है—वह जिसकी आंखें नहीं देखतीं, या वह जिसकी आंखें खुली हैं, लेकिन सच देखने का साहस नहीं?
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