गुरुवार 25 दिसम्बर को धूम धाम से निकलेगी जैन महामुनि सेठ सुदर्शन स्वामी की रथ यात्रा
सोमवार, 22 दिसंबर 2025
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जैन महामुनि सेठ सुदर्शन स्वामी के निर्वाणोत्सव 25 दिसम्बर की तैयारी हेतु महामुनि सुदर्शन निर्वाणोत्सव समिति की बैठक दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित की गयी. मौके पर बिहार स्टेट दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमिटी के मानद सचिव पराग जैन ने बैठक में बताया कि जैन महामुनि सुदर्शन स्वामी के निर्वाणोत्सव पर एक भव्य शोभा रथ यात्रा पूरे धूम धाम के साथ 25 दिसम्बर को दिगंबर जैन मंदिर गुरारा से निकाली जायेगी जो चौक, मछरहट्टा, खांजेकला, पश्चिम दरवाजा, नवाब बहादुर रोड, गुलजारबाग, सुदर्शन पथ होते हुए तुलसी मंडी स्थित श्री कमलदहजी सिद्ध क्षेत्र स्थित दिगम्बर जैन मंदिर पहुँचेगी.
रथ यात्रा प्रारंभ के पहले सूबह 8:30 बजे भगवान का अभिषेक एवं पूजन होगा.सुबह 10:30 बजे रथ यात्रा प्रारंभ होगा. रथ यात्रा में भजनों की अमृत कलाकारों द्वारा किया जाएगा.
संध्या 3 बजे कमलदह स्थित स्वामी सुदर्शन जैन मंदिर पर भगवान् का 108 कलशों से अभिषेक किया जाएगा. तथा इसके बाद महाप्रसाद होगा.
*कौन थे जैन महामुनि स्वामी सेठ सुदर्शन*
जैन संघ पटना के मीडिया सचिव एम पी जैन ने बताया कि सेठ सुदर्शन जैन मंदिर का निर्माण सन 1729 ई. में पटना के गुलजारबाग में किया गया था. सेठ सुदर्शन का जन्म चम्पापुर (भागलपुर) के नगर सेठ वृषभदास के यहाँ हुआ था. उनकी माता का नाम जिनमती था. ये जन्म से बहुत ही सुन्दर थे इसलिए इनका नाम सुदर्शन रखा गया. जो भी इन्हें देखता इनके रूप पर मोहित हो जाता था. इनकी शादी हो गई थी और इन्हें एक पुत्र भी था. नगर सेठ सुदर्शन की भागलपुर के राजा से मित्रता थी. एक बार रानी की नजर सेठ सुदर्शन पर पड़ी तो वह उनके सुन्दर रूप को देखकर मोहित हो गयी. रानी ने छल पूर्वक सेठ सुदर्शन को अपने शयन कक्ष में बुलवा लिया और उनसे प्रणय निवेदन किया तथा शादी करने की इच्छा व्यक्त की. सेठ सुदर्शन पर जब इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ तो रानी ने बदला लेने के लिए स्त्री-चरित्र की शरण ली. वह अपने हाथों से अपने वस्त्र आदि फाड़कर जगह जगह खरोंच का निशान बनाकर चिल्लाने लगी कि यह सुदर्शन मेरी इज्जत लूटना चाहता है. राजा ने यह सुना तो गुस्से में आग बबूला हो गया और सुदर्शन को फांसी का हुक्म सुना दिया. सेठ सुदर्शन निर्विकार बने रहे. जब सेठ सुदर्शन को फांसी पर चढ़ाया जाने लगा तो एक चमत्कार हुआ और शूली फूल बन गया. सुदर्शन को फांसी नहीं दिया जा सका. तब राजा सारी बात समझ गए और रानी को फांसी देने का हुक्म दिया तो सेठ सुदर्शन ने राजा से रानी को क्षमा करने का अनुरोध किया.
यह सब देखकर सुदर्शन को वैराग्य हो गया और सब कुछ छोड़कर जैन मुनि की दीक्षा ले ली और जैन मुनि के रूप में जगह जगह विचरण करने लगे. विचरण करते करते मुनि सेठ सुदर्शन पाटलिपुत्र पहुंचे. यहाँ की राज नर्तकी इतने सुन्दर मुनि सुदर्शन को देखकर मोहित हो गयी. नर्तकी तरह तरह से सुदर्शन को रिझाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुई. तब नर्तकी ने मुनि सुदर्शन को तरह तरह से कष्ट देना शुरू किया. लेकिन मुनि सुदर्शन अविचल रहे.
महामुनि सेठ सुदर्शन का पाटलिपुत्र के कमलदह में पौष शुक्ल पंचमी को निर्वाण हुआ. यहाँ पर महामुनि सुदर्शन स्वामी का निर्वाणोत्सव प्रत्येक वर्ष पौष शुक्ल पंचमी को बड़े ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष यह आयोजन गुरुवार 25 दिसम्बर को है। इस वार्षिक उत्सव में स्थानीय जैन समाज के अतिरिक्त देश के अन्य शहरों से आये जैन यात्री बड़ी संख्या में सम्मिलित होते हैं. विशाल जुलूस के साथ श्री जी की प्रतिमा को रथ में विराजमान कर पटना सिटी गुरारा मंदिर से गुलजारबाग कमलदह सिद्ध क्षेत्र मंदिर में लाया जाता है. यहाँ से श्री जी की प्रतिमा को रजत पालकी में विराजमान कर निर्वाण स्थली पर बने मन्दिर में ले जाया जाता है। यहां भगवांन 108 कलश से अभिषेक किया जाता है तथा निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है.
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